वर्तमान की शिक्षा का ज्ञान

सदियो से हमारे समाज में शिक्षक का स्थान विशेष रहा है। वैदिक काल में गुरूजी के रूप में पूजनीय रहे। राजा महाराजा भी जिनके सामने नतमस्तक रहे। कोई भी शुभ कार्य से लेकर युद्ध परामर्श के लिए गुरूजी का स्मरण किया जाता था। भले स्वयं कभी युद्ध भूमि में नही गए लेकिन उसकी बारीकियो को बखूबी समझते थे।

उस समय की शिक्षा नीति और राजनिती स्वयं में अद्वितीय थी। गुरूजी
का आश्रम ही शिष्यो के लिए 'स्कूल और हाॅस्टल' था जहाँ समाज के सभी वर्गो के बच्चे एक साथ अभ्यास करते थे। सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक ज्ञान के साथ साथ आध्यात्मिक ज्ञान भी दिया जाता था। गुरू एवं शिष्य दोनो ही अनुशासन की प्रक्रिया का दृढ़ता से पालन करते थे। शिष्य के परिजनो का कोई हस्तक्षेप नहीं था।

शिष्यो की परिक्षा लेने की परंपरा भी विचित्र थी। कोई प्रश्नपत्र नही, सिर्फ किसी चुनौती को सुलझाना होता था। इसमें भी बहुत कुछ सिखा जाता था। जीवन में आने वाली सभी परिस्थितियों को अपने विवेक से समझने व परखने के गुण विकसित किए जाते थे।

आज की परिस्थिति में गुरूजी अब शिक्षक यानि टीचर बन गए है और शिष्य विद्यार्थी यानि स्टुडन्ट बन गया है। पढ़ना और पढ़ाना दोनो बहुत बदल गया है। आज टीचर जी स्टुडन्ट को अच्छे नंबर लाने के तरीके पढ़ा रहे है। ज्यादा से ज्यादा नंबर लाने के लिए ट्यूशन भी करना पड़ता है। बच्चे किताबी ज्ञान प्राप्त कर स्कूल की परीक्षा तो पास कर ले रहे है लेकिन वास्तविक जीवन की परिक्षा में फेल होते जा रहे है।

आज शिक्षा भी व्यवसाय का एक हिस्सा बन गया है। पढ़ लिखकर बड़ा 'आदमी' बनने की लालच में अच्छा 'इंसान' बनना भूल गए है। क्योंकि वह भूल गया है बड़ा आदमी कुछ भी खरीद सकता है परन्तु अच्छा इंसान पूरी दुनिया को जीत सकता है।

'हम होंगे कामयाब एक दिन'
धन्यवाद।

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