जितिया व्रत कथा (चील और सियारिन की कथा)

 चील और सियारिन की कथा 

किसी वन में सेमर के पेड़ पर चील और पास की झाड़ी में एक सियारिन रहती थीं। दोनों में मित्रता थी और वे एक-दूसरे के लिए खाना बचाकर रखती थीं। एक बार उन्होंने कुछ महिलाओं को जितिया व्रत की तैयारी करते देखा। ये व्रत पुत्रों की लंबी आयु के लिए किया जाता है। महिलाओं को देखकर चील और सियारिन का भी मन किया कि वे भी जितिया व्रत रखें।

व्रत के दिन दोनों ने संकल्प लिया। चील ने संपूर्ण श्रद्धा और नियम के साथ उपवास रखा। वह भूख-प्यास को सह गई और व्रत का पालन किया। दूसरी ओर, सियारिन को भूख बर्दाश्त नहीं हुई। वह जंगल में शिकार करने चली गई और एक मरे हुए जानवर का मांस खाकर अपनी भूख शांत कर ली, जिससे उसका व्रत टूट गया। चील ने सियारिन को ऐसा करते हुए देख लिया और उसे डांटा भी.


कुछ समय बाद दोनों की मृत्यु हो गई और उनका जन्म मनुष्य रूप में, बहनों के रूप में, एक राजा के घर हुआ। बड़ी बहन (सियारिन) का नाम कर्पूरावती और छोटी बहन (चील) का नाम शिलावती था। विवाह के बाद कर्पूरावती को बार-बार पुत्र होते, पर वे बचते नहीं थे; शिलावती के सारे पुत्र स्वस्थ और जीवित रहे। कर्पूरावती बहुत दुखी थी। शिलावती ने बताया कि पिछले जन्म की गलती – व्रत के समय मांस खाने – का ही यह दंड है।

दुखी होकर कर्पूरावती ने फिर विधिवत जितिया व्रत किया, क्षमा मांगी और श्रद्धापूर्वक पुनः उपवास किया। फलस्वरूप उसे भी पुत्र सुख एवं संतान की रक्षा का आशीर्वाद मिला। इसी प्रसंग से यह विश्वास बना कि जितिया व्रत संयम और नियम से किया जाए तो संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है.


इस कथा से शिक्षा

जितिया व्रत को निष्ठा और विधि-विधान से करते हैं तो फलदायक होता है।

केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि श्रद्धा, संयम, और नियम का पालन जरूरी है।

समाज में यह परंपरा रही है कि संतान की रक्षा तथा सुख-समृद्धि के लिए माताएं यह व्रत करती हैं.

यह कहानी जितिया व्रत की पूजा के समय सुनना और बच्चों को सुनाना शुभ व लाभकारी माना जाता है।

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