जनजातीय गौरव के प्रतीक- भगवान बिरसा मुण्डा
बिरसा मुंडा
धरती आबा (पृथ्वी के पिता)
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को बंगाल प्रेसीडेंसी के उलिहातु गाँव में हुआ था, जो अब झारखंड के खूंटी जिले में है। उनके माता-पिता सुगना मुंडा और करमी हातू थे। उनका बचपन गरीबी में बीता और उन्होंने चाईबासा के एक मिशनरी स्कूल में कुछ साल पढ़ाई की, जहाँ उन्होंने ईसाई धर्म के बारे में जाना।
बिरसाइत आंदोलन
बिरसा मुंडा ने "बिरसाइत" नामक एक नए धर्म की स्थापना की, जिसमें मुंडाओं की पारंपरिक मान्यताओं के साथ-साथ हिंदू और ईसाई धर्मों के तत्व भी शामिल थे। उन्होंने खुद को एक ईश्वर का दूत घोषित किया और लोगों को अंधविश्वास, शराब और जादू-टोना जैसी सामाजिक कुरीतियों को छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने स्वच्छता, नैतिक जीवन और एकेश्वरवाद पर जोर दिया। उनके अनुयायियों में मुंडा, उरांव और खारिया जनजातियों के लोग शामिल थे।
उलगुलान (महान विद्रोह)
बिरसा मुंडा ने 1899-1900 में ब्रिटिश सरकार और स्थानीय जमींदारों के खिलाफ "उलगुलान" (महान विद्रोह) का नेतृत्व किया। यह विद्रोह ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों और वन अधिनियमों के खिलाफ था, जिन्होंने आदिवासियों को उनके पारंपरिक भूमि अधिकारों से वंचित कर दिया था। बिरसा ने अपने अनुयायियों को लगान न देने का आदेश दिया और एक स्वतंत्र मुंडा राज की स्थापना का आह्वान किया। इस विद्रोह में ब्रिटिश कार्यालयों, पुलिस थानों और जमींदारों की संपत्तियों पर हमले शामिल थे।
गिरफ्तारी और मृत्यु
फरवरी 1900 में ब्रिटिश सेना ने बिरसा मुंडा को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें रांची जेल में डाल दिया गया। 9 जून 1900 को मात्र 25 साल की उम्र में जेल में ही उनकी मृत्यु हो गई। ब्रिटिश सरकार ने उनकी मृत्यु का कारण हैजा बताया, लेकिन कई लोगों का मानना है कि उनकी हत्या की गई थी।
विरासत
बिरसा मुंडा को आज भी आदिवासी अधिकारों, सामाजिक न्याय और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। उनके आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार को आदिवासियों के भूमि अधिकारों की रक्षा के लिए छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 पारित करने के लिए मजबूर किया। भारत सरकार ने उनकी जयंती, 15 नवंबर को "जनजातीय गौरव दिवस" के रूप में घोषित किया है।

Comments
Post a Comment